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आजादी की लड़ाई में भाजपा का कोई योगदान नहीं – सुशील आनंद शुक्ला

आजादी की लड़ाई में भाजपा का कोई योगदान नहीं – सुशील आनंद शुक्ला

भाजपा का विभाजन विभीषिका दिवस राजनैतिक नौटंकी

हरियर एक्सप्रेस, रायपुर। भाजपा के द्वारा मनाये गये विभाजन विभीषिका दिवस को कांग्रेस ने भाजपा की नौटंकी बताया है। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि विभाजन विभीषिका दिवस वे मना रहे जो देश की आजादी की लड़ाई का विरोध कर रहे थे। आजादी की लड़ाई में भाजपा का कोई योगदान नहीं है। भाजपाईयों के पूर्वज आजादी के आंदोलन का विरोध कर अंग्रेजों की चाटुकारिता करते थे। कांग्रेस के नेतृत्व में जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंग्रेजी हूकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे तब भाजपा की विचारधारा को मानने वाले आजादी की लड़ाई को कमजोर करने का काम कर रहे थे। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब भारत छोड़ो आंदोलन और असहयोग आंदोलन तथा अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था तब भाजपाईयों के पूर्वक हिन्दू महासभा के लोग इन आंदोलनों के खिलाफ में खड़े थे तथा मुस्लिम लीग के साथ मिलकर अंग्रेजों की सहयोगी की भूमिका में थे।

प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस के मूलस्वरूप हिन्दू महासभा का गठन 1925 में हुआ, देश आजाद 1947 में हुआ इन 22 सालों तक भारत के आजादी की लड़ाई में हिन्दू महासभा का क्या योगदान था? भाजपाई बता नहीं सकते। 1942 में कांग्रेस, महात्मा गांधी की अगुवाई में भारत छोड़ो आंदोलन चला रही थी, तब भाजपा के पितृ पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी अंग्रेजी हूकूमत को सलाह दे रहे थे कि भारत छोड़ो आंदोलन को क्रूरतापूर्वक दमन किया जाना चाहिये। अंग्रेजों के इशारे पर मुस्लिम लीग के साथ मिलकर बंगाल में अंतरिम सरकार बनाए थे। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजाद हिन्द फौज में युवाओं की भर्ती होने की अपील कर रहे थे तब भी आरएसएस के पूर्वजों ने इसका विरोध किया था।

प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि देश की आन-बान-शान का प्रतीक रहे तिरंगा को भाजपा ने पितृ पुरुष गोलवलकर ने देश के लिये अपशगुन बताया था। तिरंगे के प्रति सम्मान का आडंबर कर रही भाजपा के आदर्श गोलवलकर ने अपनी पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स में तिरंगा को राष्ट्रीय ध्वज मानने से ही मना कर दिया था। इस पुस्तक में उन्होंने लोकतंत्र और समाजवाद को गलत बताते हुए संविधान को एक जहरीला बीज बताया था। 14 अगस्त 1947 को आरएसएस के मुखपत्र द ऑर्गेनाइजर में लिखा था “तीन शब्द ही अशुभ है, तीन रंगों वाला झंडा निश्चित तौर पर बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करेगा और देश के लिये हानिकारक साबित होगा।” 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गांधी की हत्या कर दी गयी तो अखबारों के माध्यम से खबरें आई थीं कि आरएसएस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंदकर खुशी मना रहे थे। आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आरएसएस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी।

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