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लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय: कोरबा प्रेस क्लब में विधायक अनुज शर्मा ने साझा कीं आपातकाल की भयावह यादें…

लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय: कोरबा प्रेस क्लब में विधायक अनुज शर्मा ने साझा कीं आपातकाल की भयावह यादें…

देश की युवा पीढ़ी को आपातकाल की सच्चाई से अवगत कराना आवश्यक – अनुज

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हरियर एक्सप्रेस, कोरबा। कोरबा के प्रेस क्लब तिलक भवन में आयोजित एक विशेष प्रेस वार्ता के दौरान मुख्य वक्ता के रूप में धरसीवाँ विधायक अनुज शर्मा शामिल हुए और मीडिया से सीधा संवाद किया। साथ ही संविधान हत्या दिवस के विरोध में मौन पदयात्रा भी निकाली गई। इस दौरान उन्होंने वर्ष 1975 में देश पर थोपे गए आपातकाल के 51 वर्ष पूरे होने पर उस काले और भयावह दौर की स्मृतियों को जनता के सामने रखा।

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए विधायक अनुज शर्मा ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध ठहराए जाने के बाद सत्ता बचाने के लिए आपातकाल लगाया गया। इसके साथ ही देशभर में विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, जॉर्ज फर्नांडिस सहित हजारों नेताओं को जेलों में बंद कर दिया गया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के लंबे संघर्ष और बलिदान से प्राप्त लोकतंत्र को कांग्रेस सरकार ने एक रात में समाप्त कर देश को तानाशाही की दिशा में धकेल दिया। आपातकाल के दौरान संसद, न्यायपालिका और राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक संस्थानों की भूमिका कमजोर कर दी गई तथा संविधान में व्यापक संशोधन किए गए। आज से 51 वर्ष पूर्व किस तरह उच्च पदों पर बैठे लोगों ने अपनी सत्ता को बचाने के लिए उसका घोर दुरुपयोग किया था। सत्ता के अहंकार में संविधान और लोकतंत्र की खुलेआम हत्या की गई, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बेरहमी से कुचला गया और देश को एक ऐसी अपूरणीय क्षति पहुँचाई गई, जिसे याद कर आज भी मन सिहर उठता है। जिस संविधान को हमारे मनीषियों ने बाबा साहेब अंबेडकर के नेतृत्व में लाखों कुर्बानियों के बाद गढ़ा था, उस संविधान की मूल भावना को कुचल दिया गया। देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार रातों-रात छीन लिए गए। सच बोलने की आज़ादी, अपनी बात रखने का अधिकार और यहाँ तक कि जीने के अधिकार पर भी पहरा लगा दिया गया।

आज मैं प्रेस क्लब में खड़ा हूँ, इसलिए यह याद दिलाना और भी जरूरी है कि उस दौर में सबसे पहला प्रहार मीडिया पर हुआ था। अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई, सेंसरशिप लागू कर दी गई। जो सत्ता के आगे नहीं झुका, उसे जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। जब न्यायपालिका को डराया जाए, प्रेस की आवाज़ को दबाया जाए और विपक्ष के नेताओं को जेल में ठूंस दिया जाए, तो वह लोकतंत्र नहीं, तानाशाही होती है। लेकिन भारत की जनता की चेतना को वो तानाशाह मानसिकता कभी हरा नहीं सकी। आज 51 वर्ष बाद, हम यहाँ सिर्फ उस दर्द को याद करने नहीं आए हैं, बल्कि एक संकल्प लेने आए हैं। हम संकल्पबद्ध हैं कि इस देश में फिर कभी कोई तानाशाही मानसिकता सिर न उठा पाए। हमें आने वाली पीढ़ी को बताना होगा कि यह आज़ादी और यह लोकतंत्र कितनी मुश्किलों से बचा है। मैं कोरबा प्रेस क्लब के माध्यम से देश और प्रदेश के सजग नागरिकों से आह्वान करता हूँ कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए, इस दमनकारी सोच के खिलाफ हमारी जागरूकता हमेशा बनी रहनी चाहिए। देश के नागरिकों के अधिकार अक्षुण्ण रहें, यही हमारा सबसे बड़ा संकल्प है।

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