June 5, 2026

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पासपोर्ट रिनीवल मामले में लंबित आपराधिक मामलों का सामना कर रहे 66 वर्षीय व्यक्ति को हाईकोर्ट से राहत – अधिवक्ता सिब्तैन रज़ा

पासपोर्ट रिनीवल मामले में लंबित आपराधिक मामलों का सामना कर रहे 66 वर्षीय व्यक्ति को हाईकोर्ट से राहत – अधिवक्ता सिब्तैन रज़ा

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हरियर एक्सप्रेस, रायपुर। अधिवक्ता सिब्तैन रज़ा ने बताया कि राजस्थान हाईकोर्ट ने 23 लंबित आपराधिक मामलों का सामना कर रहे 66 वर्षीय व्यक्ति को राहत देते हुए पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र देने से इनकार करने वाले कोटा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द किया है। जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली की पीठ ने कहा कि केवल लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को पासपोर्ट नवीनीकरण से वंचित कर विदेश यात्रा से रोकना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी सहित विभिन्न आरोपों से जुड़े लगभग 23 आपराधिक मामले ट्रायल कोर्ट में लंबित हैं। इन मामलों के लंबित रहने के दौरान उसने पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था। हालांकि, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोटा ने 8 अप्रैल, 2024 को लंबित मामलों की संख्या का हवाला देते हुए उसका आवेदन खारिज किया था, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाइकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्ता के खिलाफ कई मामले लंबित हैं लेकिन अभी किसी भी मामले में उसे दोषी ठहराया नहीं गया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता के बच्चे विदेश में रहते हैं और वह उनसे मिलने जाना चाहता है।

पीठ ने पासपोर्ट अधिनियम 1967 की संबंधित धाराओं तथा विभिन्न हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित है। इससे केवल न्यायसंगत, निष्पक्ष तथा विधिसम्मत प्रक्रिया द्वारा ही वंचित किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक मामलों का लंबित होना पासपोर्ट नवीनीकरण से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने बिना पर्याप्त कारण दर्ज किए तथा लागू कानूनी प्रावधानों पर विचार किए बिना आदेश पारित किया जो विधि के अनुरूप नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया कि सक्षम पासपोर्ट प्राधिकरण याचिकाकर्ता के नए आवेदन पर 30 दिनों के भीतर कानून के अनुसार निर्णय ले और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पूर्व आदेश से प्रभावित हुए बिना उसका निस्तारण करे।

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